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Saturday, January 26, 2019

Budget 2019: आज़ादी से पहले भारत के सबसे काबिल वित्तमंत्री!

Image: Third-party reference

Budget 2019: आज़ादी से पहले भारत के सबसे काबिल वित्तमंत्री!

इस एक शख्स के बगैर अधूरा है भारत के इतिहास में बजट का जिक्र जिसने अपनी नीतियों के लिए अकबर के दौर में लूटी वाहवाही. अक़बर से भी पहले एक शासक आए जिन्होंने भारत को रुपया दिया. जानिए यह दोनों शख्स कौन हैं..

Updated on: January 26, 2019



फरवरी का महीना आते ही साल भर का हिसाब-किताब शुरू हो जाता है. सरकार भी बही-खाता खोलकर बैठ जाती है और वित्त मंत्री बजट के जरिए आने वाले साल में होने वाले खर्चे और निवेश को लेकर अपने इरादों को जनता के सामने रखते हैं. लेकिन क्या बजट का यह चलन सदियों से ऐसे ही चला आ रहा है. या फिर पहले मामला कुछ और हुआ करता था. यहां सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर सरकारी वित्त का संचालन पहले कैसे हुआ करता था?आगे बढ़ने से पहले बता दें कि बजट शब्द एक पुराने फ्रेंच शब्द से लिया गया है, जिसका मतलब है छोटा सा बैग. शायद उस वक्त एक छोटे से बैग में पूरी दौलत समा जाती होगी या फिर उस वक्त के मंत्री एक छोटे से बैग में अपनी अहम घोषणाओं को लपेटकर लाया करते होंगे. खैर, अब इस छोटे से बैग की जगह उस सूटकेस ने ले ली है जो बजट से पहले वित्तमंत्री के हाथ में नज़र आता है.वैसे आज़ाद भारत से भी पहले की बात की जाए तो आधुनिक इतिहास में अकबर के नौ रत्नों में से एक राजा टोडरमल को अनाधिकारिक तौर पर पहला वित्तमंत्री कहा जाता है. उस दौर में कैलेंडर अलग हुआ करते थे, लेकिन अभी की तरह तब भी साल भर के राजस्व और व्यय का हिसाब जनता दरबार में रखा जाता था. इसी तरह के दरबार में अकबर के शासनकाल के वित्तमंत्री राजा टोडरमल, भूमि सुधार कार्यक्रम लेकर आए थे. टोडरमल ने ज़मीन को मापने की पहल की थी. ज़मीन और फसल मापने की जरूरत राजस्व और कर के नए तरीके लाने की वजह से खड़ी हुई थी. सदियों से अनाज उत्पादन राजस्व का अहम जरिया होता आया है.



तोडरमल ने अपने कार्यकाल में भूमि सुधार से जुड़े फैसले लिये

बतौर वित्तमंत्री राजा टोडरमल ने राजस्व का नया तरीका ईजाद किया जिसे ‘ज़ब्त’ या ‘दहशाला’ के नाम से जाना जाता है. इसके तहत टोडरमल ने पिछले दस साल में फसल की पैदावार और उसकी कीमत का औसत निकालना शुरू किया. इसके आधार पर हर फसल की कीमत पहले से ही तय कर ली जाती थी, जिसका एक चौथाई कर या टैक्स के तौर पर देना पड़ता था. इस कर का भुगतान नकदी में ही करना होता था.राजस्व का यह तरीका उन्हीं इलाकों में लागू किया गया जहां मुग़ल शासन था. ज़मीनों को उनकी उत्पादन क्षमता के हिसाब से श्रेणीगत किया गया, ताकि उसी पैमाने से कर लागू किया जाए और किसी गरीब किसान पर अतिरिक्त भार न पड़े. इस व्यवस्था को कायम रखने का काम पटवारी करते थे जो कि आज भी प्रचलित है.ऐसा भी नहीं है कि पहले के दौर में पब्लिक अकाउंटिंग का अर्थ सिर्फ कर वसूली तक ही सीमित था. लोक-लेखा की बात जब होती है, तब शेर शाह सूरी का नाम भी याद किया जाता है. 1538 से 1545 तक उत्तर भारत पर सूरी साम्राज्य का दबदबा रहा. अकबर से पहले राजा टोडरमल ने शेर शाह सूरी के राज्यकाल में ही अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया था. दहशाला का खाका भी शेर शाह सूरी के वक्त ही खींच दिया गया था, जिसे अकबर के दौर में अमली जामा पहनाया गया.

शेर शाह सूरी ने सड़क निर्माण में बजट का बड़ा हिस्सा लगाया

शेर शाह सूरी को सरकारी वित्त के सही इस्तेमाल के लिए जाना जाता है. एशिया की सबसे लंबी और पुरानी सड़क में से एक ग्रांड ट्रंक रोड का श्रेय सूरी को ही दिया जाता है. राजस्व का इस्तेमाल सड़क जैसी मूलभूत जरूरत के निर्माण में करने के लिए शेर शाह सूरी को याद किया जाता है. चुंगी या टॉल टैक्स का मौजूदा रूप दरअसल सूरी की ही देन है, वस्तु विनिमय (बार्टर) की जगह नगदी लेन देन की व्यवस्था के लिए भी शेर शाह सूरी के दौर का नाम है. रुपया भी सूरी की ही देन है. पहले ‘रुपया’ शब्द किसी भी तरह के चांदी के सिक्के के लिए इस्तेमाल होता था. लेकिन सूरी साम्राज्य के दौर में रुपया, उस चांदी के सिक्के के लिए इस्तेमाल होने लगा जिसका वजन 11.53 ग्राम का हुआ करता था. मोहुर नाम के सोने का सिक्का (169 ग्रेन) और पैसा कहे जाने वाले तांबे के सिक्के भी सूरी सरकार के दौरान ही ढाले गए. सूरी साम्राज्य की यही सिक्का प्रणाली मुगलों ने भी जारी रखी.

रक्षा क्षेत्र में जीडीपी का 2-3 प्रतिशत हिस्सा खर्च किया जाता है

ब्रिटिश राज से पहले भी भारत में रक्षा मामलों पर सबसे ज्यादा खर्च करने का प्रावधान था. शेर शाह सूरी से लेकर अकबर और उनके आगे के दौर में भी बजट का 40 प्रतिशत हिस्सा रक्षा क्षेत्र के लिए रखा जाता था. जाहिर तौर पर उस दौर में युद्ध की संभावनाएं ज्यादा हुआ करती थीं और यह प्रचलन भारत की आजादी के बाद भी काफी वक्त तक चलता रहा. 1962 में, जब भारत-चीन युद्ध हुआ था, उस साल जीडीपी का 1.59% प्रतिशत रक्षा को आवंटित किया गया था. लेकिन युद्ध की इस मार को झेलने के बाद अगले 30 साल बाद तक लगातार जीडीपी का 3 प्रतिशत हिस्सा रक्षा क्षेत्र को दिया जाता रहा. पिछले साल रक्षा बजट 2.74 लाख करोड़ था, जो कि रक्षा मामले के जानकारों के मुताबिक फीसदी के लिहाज़ से यह अभी तक का सबसे कम बजट आवंटन रहा.

source: News18 Hindi

Wednesday, January 16, 2019

रानी लक्ष्मीबाई के निधन के बाद उनके पुत्र का हुआ था ऐसा 'हश्र' पूरी कहानी सुन भर आएगी आँखे

रानी लक्ष्मी बाई के निधन के बाद उनके पुत्र का हुआ था ऐसा 'हश्र', पूरी कहानी जान भर आएंगी आंखें

 16 Jan 2019

नई दिल्ली। "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।" अंग्रेजों का सामना करने वाली रानी लक्ष्मी बाई के बारे में कौन नहीं जनता। 1857 के युद्ध के बारे में कौन नहीं जानता। रानी लक्ष्मी बाई अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को पीठ से बांधे हुए युद्ध करने की वह गाथा आज भी लोगों की आंखों में आंसू ले आती है। सबको यह पता है रानी लक्ष्मी बाई उस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुईं लेकिन क्या किसी को पता है कि उनके बेटे के साथ क्या हुआ।लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव और उनके वंशज का क्या हुआ उनकी ज़िंदगी कैसी थी इस बारे में आज हम आपको पूरी जानकारी देंगे। शायद आपको न पता हो लेकिन दामोदर राव को रानी लक्षमी के जाने बाद बहुत कष्ट झेलने पड़े। कहते हैं उन्हें भीख मांगकर गुज़ारा करना पड़ा था। बता दें कि लक्ष्मी बाई ने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन दुर्भाग्यवश चार माह बाद ही उसकी असमय मृत्यु हो गई। उनके पति और राजा गंगाधर राव काफी बीमार रहने लगे थे। रानी ने राज्य को उसका उत्तराधकारी दिलाने के लिए दामोदर को 5 साल की उम्र में गोद लिया था।

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1857 के युद्ध के दौरान लक्ष्मी बाई ने दामोदर की ज़िम्मेदारी अपने विश्वास पात्र सरदार रामचंद्र राव देशमुख सौंपी थी। युद्ध में अपनी जान की आहुति देने के बाद रामचंद्र राव देशमुख दो वर्षों तक दामोदर को अपने साथ लिए ललितपुर जिले के जंगलों में भटकते रहे। अंग्रेजों के डर से कोई उनकी मदद के लिए आगे नहीं आया। कई बार तो उन्हें खाना तक नसीब नहीं होता था। कई दिन जंगलों में कष्ट झेलने के बाद वे झालरापाटन पहुंचे जहां उन्हें नन्हेखान मिले। नन्हेखान महारानी के मृत्यु के पश्चात झालावाड़-पतन में आकर रहने लगे थे तथा एक अंग्रेज अधिकारी मिस्टर फ्लिंक के दफ्तर में काम करते थे। नन्हेखान ने ही दामोदर को मिस्टर फ्लिंक से मिलवाया था। मिस्टर फ्लिंक दामोदर की पेंशन की व्यवस्था की। पेंशन देने ले लिए अंग्रेज़ सरकार ने दामोदर से सरेंडर करने के लिए कहा।


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काफी सिफारिश लगाने के बाद दामोदर राव को 200 रुपया प्रति माह पेंशन मिलने लगी। आपको जानकारी के लिए बता दें कि झांसी की रानी के वंशज इंदौर के अलावा देश के कुछ अन्य भाग में रहते हैं। यह लोग अपने नाम के पीछे झांसीवाला लिखते हैं। दामोदर की चाची और उनकी असली मां ने 1860 में उनका विवाह करा दिया था लेकिन होनी को कुछ और ही मंज़ूर होता है। किसी कारणवश दामोदर की पहली पत्नी का देहांत हो गया है। इसके बाद उनकी दूसरी शादी करा दी जाती है जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति होती है। उनके पुत्र लक्ष्मण राव के बेटे कृष्ण राव और चंद्रकांत राव का वंश भी आगे बढ़ता है और कृष्ण राव के दो पुत्र मनोहर राव, अरूण राव तथा चंद्रकांत के तीन पुत्र अक्षय चंद्रकांत राव, अतुल चंद्रकांत राव और शांति प्रमोद चंद्रकांत राव हुए। लक्ष्मण राव तथा कृष्ण राव इंदौर न्यायालय में टाईपिस्ट का कार्य करते थे। अरुण राव मध्यप्रदेश विद्युत मंडल से बतौर जूनियर इंजीनियर 2002 में सेवानिवृत्त हुए हैं। उनका बेटा योगेश राव सॅाफ्टवेयर इंजीनियर है। बता दें कि, लक्ष्मी बाई पर एक बयोपिक बन रही है जिसमें कंगना रनौत लक्ष्मी बाई का किरदार निभा रही हैं। इस बयोपिक की जनवरी 2019 में रिलीज़ होने की संभावना है।