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Saturday, November 10, 2018

Chhath: नहाय खाय से हुई चार दिनों का महापर्व छठ की शुरुआत


Patna: “आज से छठ पूजा की शुरुआत हो रही है. पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाये’ के रूप में मनाया जाता है। घर की सफाई के बाद छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरआत करते हैं । द्रौपदी ने रखा था व्रत : इस पर्व को स्त्री और पुरुष समान रूप से मानते हैं। छठ के सम्बन्ध में अनेक कथाये प्रचलित है। जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हर गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था।

लोक परम्परा के अनुसार सूर्य देव और छठी मइया का सम्बन्ध भाई- बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी। छठ पर्व की परंपरा में भौत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है। षष्ठी तिथि एक खास खगोलीय अवसर है। इस पर्व में सफाई का बहुत ध्यान रखा जाता है। पूजा में प्राकृतिक वस्तुओं और उनसे बने समान का उपयोग किया जाता है। एक ही घाट पर विभिन्न जाति के लोग इकट्ठा होते हैं, जिनसे सामाजिक समरसता भी बढ़ती है।

छठ पर्व के समय सूर्य की पराबैगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती है। उसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथासंभव रक्षा करने का सामर्थ इस परंपरा में है। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है। हिन्दुओं दवारा मनाये जानेवाले इस पर्व को अन्य धर्म के लोग भी मानते हैं। पिछले एक दशक में धीरे-धीरे इस पर्व का विस्तार हुआ है। यह पर्व प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ विश्व भर में प्रचलित व प्रसिद्ध हो गया है। चार दिवसीय इस व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। इसलिए इसे छठ व्रत कहते हैं।

छठ पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है ।पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी को मनाये जानेवाले छठ पर्व को चैती छठ वे कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी को मनाये जानेवाले पर्व को कार्तिकी छठ कहते हैं। सूर्य यानी आदिदेव सूर्य की धरती के सकल प्राणी को अत्यंत आवश्यकता है। धरती सूखे, वातावरण ऊष्मा से भरा हो, प्रकशित हो अग-जग। सूर्य जीवन है। सूर्य ही जल के स्रोत को रह देता है। इस मौके पर यह सकल्प लेना सही होगा कि हम विलुप्त होती उद्विज, फल-फूल, कंद को प्रयोग में लाने के लिए उसका संरक्षण करें।

Input: pune samachar.com

Wednesday, November 07, 2018

शहर में मनाई गई दिवाली रौशनी से नहाया शहर

ARYA NEWS LIVE
8 Nov. 2018; 03:05 am IST
Muzaffarpur News Desk



मुजफ्फरपुर: पर्व है पुरुषार्थ का,
दीप के दिव्यार्थ का,
देहरी पर दीप एक जलता रहे,
अंधकार से युद्ध यह चलता रहे,
हारेगी हर बार अंधियारे की घोर-कालिमा,
जीतेगी जगमग उजियारे की स्वर्ण-लालिमा,

मुजफ्फरपुर में दिवाली बड़ी धूमधाम से मनाया गया। हर ओर दिवाली की रौनक देखने को मिली। शाम को लोगो ने लक्ष्मी गणेश की पूजा अर्चना की। शहर में दूसरी ओर माँ काली की भी पूजा अर्चना की गई। इसके बाद लोगो ने एक दूसरे को बधाई दी। दिवाली के शुभ अवसर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहारवासियो को शुभकामनाये दी। दिवाली को लेकर लोगों में अलग उत्साह देखने को मिला।शहर रौशनी से नहा रहा था। कोर्ट के आदेशानुसार इस बार पटाखों को केवल 8 बजे से 10 बजे तक ही छोड़ने की अनुमति के बाद शहर में पटाखे छोड़े जाने में कोई कमी नहीं रखी गई। ब्रह्मपुरा स्थित लक्ष्मी मंदिर को काफी भव्य तरीके से सजाया गया।

Sunday, November 04, 2018

दीपावली 2018: जानें, दिवाली के 5 दिनों का महत्व

धन तेरस से शुरू होकर भाई दूज पर खत्म होने वाला यह त्योहरा अपने साथ ढेर सारी सुख समृद्धि लेकर आता है. इन पांच दिनों में अलग-अलग देवी देवताओं की पूजा की जाती है.
November 4, 2018, 10:35 PM IST



हिंदुओं का सबसे बड़ा त्योहार दिवाली सिर्फ एक दिन नहीं करीब पांच दिन का त्योहार होता है. धन तेरस से शुरू होकर भाई दूज पर खत्म होने वाला यह त्योहरा अपने साथ ढेर सारी सुख समृद्धि लेकर आता है. इन पांच दिनों में अलग-अलग देवी देवताओं की पूजा की जाती है. तो आइए जानते हैं कि इन पांच दिनो में किस दिन कौनसा त्योहार मनाया जाएगा...(Image: PTI)



धनतेरस: धनतेरस संस्कृत भाषा के दो शब्द 'धन' (धन) और 'तेरस' (अश्विन महीने में कृष्णा पक्ष का 13वां दिन) से मिलकर बना है. इस दिन धन की देवी-लक्ष्मी और कुबेर की पूजा की जाती है. हिंदू इस दिन सोने के गहने और चांदी के बर्तन खरीदते हैं. माना जाता है कि ऐसा करने पर गुडलक वाला यह दिन सालभर समृद्धि को आकर्षित करता है. इस बार धनतेरस 5 नवंबर 2018 को मनाया जाएगा. (Image: PTI)



छोटी दिवाली: धनतेरस के अगले दिन छोटी दीवाली मनाई जाती है. छोटी दिवाली को नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है. छोटी दिवाली इस बार 6 नवंबर के दिन मनाई जाएगी. पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन भगवान कृष्ण की पत्नी (सत्यभामा) ने दानव राजा नरकसुर की हत्या कर दी थी. (Image:PTI)



लक्ष्मी पूजा: हालांकि दिवाली अमावस्या (चंद्रमा नहीं) पर पड़ती है, लेकिन इसे सबसे शुभ रात्रि माना जाता है क्योंकि इस दिन भगवान राम वनवास काटकर वापस लौटे थे. पांच दिन लगातार चलने वाले त्योहारों में दिवाली का त्योहार सबसे बड़ा और अहम होता है. इसी दिन शांति, समृद्धि और धन के लिए लक्ष्मी-गणेश की पूजा की जाती है. लक्ष्मी पूजन के दौरान, पांच भगवानों की पूजा एक साथ की जाती है - गणेश (एक शुभ समारोह की शुरुआत के लिए) महालक्ष्मी (धन की देवी), महासरस्वती (विद्या की देवी), और महाकाली (समय और मृत्यु की देवी), और कुबेर (देवताओं का खजाना). (Image:PTI)



गोवर्धन पूजा और गुड़ी पड़वा: ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण ने देवराज इंद्र के गुस्से से गोकुल को बचाने के लिए गोवर्धन पहाड़ को एक उंगली पर उठा लिया था, इसलिए दिवाली के ठीक अगले दिन गोवर्धन की पूजा होती है. गोवर्धन पूजा के दिन भगवान कृष्ण के लिए छप्पन (56) भोग बनाए जाते हैं जिसे अन्नकुट पूजा भी कहते हैं. कुछ स्थानों पर इस दिन को गुड़ी पड़वा के रूप में भी मनाया जाता है. रीति-रिवाजों के मुताबिक, नवविवाहित लड़कियों को अपने पति के साथ अपने मायके में त्यौहार देने और उत्सव मनाने के लिए आमंत्रित किया जाता है. इस साल गोवर्धन पूजा 8 नवंबर के दिन की जाएगी. (Image:PTI)



भाई दूज: भाई दूज का त्योहार बहन और भाई के प्यार का प्रतीक है. पांच दिनों तक चलने वाले त्योहारों में सबसे आखिर में भाई दूज मनाया जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार, इस दिन मृत्यु के देवता यमराज लंबे समय के बाद अपनी बहन यामी से मिलने गए थे. यामी ने यमराज के माथे पर तिलक लगाकर उत्साह के साथ उनका स्वागत किया था. यमराज अपनी बहन के प्यार और स्वागत से इतने उत्साहित हो गए कि उन्होंने कहा कि यदि हर साल सभी बहने इस दिन अपने भाई को तिलक लगाएंगी तो उनके भाई को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकेगा. वह यमराज से भी सुरक्षित रहेगा. इस बार भाई दूज 9 नवंबर को मनाया जाएगा. (Image:PTI)


Input: News18 India

Tuesday, October 30, 2018

शहर में मनाया जा रहा है चेहलुम का पर्व जाने क्या है और क्यू मनाया जाता है यह

Image Source: Google


 शहर में मनाया जा रहा है चेहलुम का पर्व जाने क्या है और क्यू मनाया जाता है यह
Arya News Live
muzaffarpur news desk
30 Oct. 2018.

आज चेहलुम का पर्व पुरे भारत ही नहीं अपितु पुरे विश्व में मनाया जा रहा है। यह कोई ख़ुशी नहीं मुसलमानों के लिए गम का दिन है। क्या आप जानते है कि क्यू मनाया जाता है यह पर्व अगर नही जानते है तो कोई बात नहीं हम आपको बताते है।

चेहलुम अथवा चेहल्लुम (अंग्रेज़ी:Chehelom) एक मुस्लिम  पर्व है जिसे मुहर्रम के ताज़िया दफ़नाए जाने के चालीसवें दिन मनाया जाता है। चेहलुम वस्तुत: इज़ादारी असत्य पर सत्य की जीत के रूप में भी मनाया जाता है। वास्तव में चेहलुम हज़रत हुसैन की शहादत का चालीसवां होता है। इस दिन न केवल भारत, बल्कि संपूर्ण विश्व में चेहल्लुम का आयोजन किया जाता है। वैसे सफ़ेद ताज़िया इसलिए भी निकाला जाता है कि हज़रत इमाम मेंहदी के पिता हज़रत इमाम अस्करी की भी शहादत हुई थी। कुछ लोग इस बात का आरोप भी लगाते हैं कि चेहल्लुम हज़रत उमर की मृत्यु की खुशी में मनाया जाता है, जो सरासर अनुचित है। वास्तव में इसका रिश्ता तो ‘मरग-ए-यज़ीद’ से है। सुप्रसिद्ध उर्दू कवि व स्वतंत्रता सेनानी मौलाना मुहम्मद अली ने कहा है कि-

"‘कत्ल-ए-हुसैन अस्ल में मरग-ए-यज़ीद है।
इस्लाम ज़िंदा होता है हर करबला के बाद।"



★ चेहलुम का उद्देश्य

इसका आयोजन निस्संदेह इस्लाम धर्म के लिए हज़रत मुहम्मद  के नवासे इमाम हुसैन की सेवाओं और उनके बलिदानों को स्वीकार करना है। इमाम हुसैन का व्यक्तित्व हमेशा से बलिदान का आदर्श रहा है। उससे बड़ा बलिदान इस नश्वर संसार में विरले ही मिलेगा। इमाम हुसैन का युग इस्लामी इतिहास में ऐसा युग था, जिसमें इस्लाम के विरुद्ध ऐसी शक्तियां उठ खड़ी हुई थीं, जो सीधे-साधे मुसलमानों को अपना निशाना बनाती थीं। ऐसे में हज़रत हुसैन ने इस्लाम की खोई हुई गरिमा को वापिस लाने और उसे सुदृढ़ करने का भरसक प्रयास किया, यहां तक कि इस पथ पर चलते हुए उन्होंने अपने जान की भी परवाह नहीं की।

Friday, October 19, 2018

यह है दशहरा साहेब || Happy Dushara


यह दशहरा है साहब...

राजा राम थे तो, रावण भी राजा था।
परमवीर राम थे तो, रावण भी महाबली था।

ज्ञानी राम थे तो, महाज्ञानी रावण भी था।
सन्यासी राम बने तो, संयमी रावण भी रहा।

पति धर्म राम ने पूरा किया तो, भ्राता धर्म रावण ने पूर्ण किया।
पिता को दिया वचन राम ने निभाया तो,
बहन को दिया वचन रावण ने भी निभाया।

सत्य राम थे तो झूठा रावण भी नहीं था।

🏹 फिर युद्ध क्यों? 🏹
राम की जीत और रावण की हार क्यों?

               🚩 यह युद्ध था... 🏴

ज्ञान और महाज्ञान के सही-गलत उपयोग का।
सत्य से ऊपर अति आत्मविश्वास का।

परिजन की सलाह नकारने का।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम और मतिभ्रम दशानन रावण का।

राम नीति और रावण प्रवृत्ति का।
त्यागी और अहंकारी रावण का।

आइये इस दशहरे पर
देश, समाज और अपने अंदर के राम-रावण को पहचाने।

ज्ञान और बल के सही-गलत उपयोग को जाने।
सत्य और अहंकार के भेद को पहचाने।

🚩 विजयदशमी की शुभकामनाएं🚩


Source: Social Media

Tuesday, October 09, 2018

navratri 2018 कलश स्थापना करे इस समय, यह है कलश स्थापित करने का सही तरीका



navaratri 2018: कलश स्थापना करे इस समय, यह रहा कलश स्थापित करने का सही तरीका

आर्या न्यूज़ लाइव टीम,नई दिल्ली
Updated: Tue, 09 Oct 2018

navaratri 2018: शारदीय नवरात्र की शुरुआत कल यानि बुधवार से हो रही है। इस बार देवी का आगमन नौका पर हो रहा है और देवी का यह आगमन कल्याणकारी माना जाता है। पहले दिन कलश स्थापित कर लोग नौ दिन तक देवी के व्रत का संकल्प लेते है।

★ Navaratri 2018: यह है कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त, इस बार मुहूर्त सिर्फ एक घंटे दो मिनट का

बुधवार को नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 11:36 बजे से दोपहर 12:24 बजे तक है। लेकिन दोपहर 12 बजे के बाद राहू काल लगने से 12 बजे तक ही कलश स्थापना करने का अभिजित मुहूर्त माना जा रहा है। जयोतिषचार्यो का कहना है कि सुबह 11:36 से दोहपर 12 बजे तक ही कलश स्थापना का सबसे अच्छा समय है।

यह भी पढ़े: महालया अमावस्या कब और क्यू मनाया जाता है, जाने क्या है इसका महत्व

★ यह है कलश स्थापना का सही तरीका

कलश स्थापना के लिए मिट्टी, तांबे या सोने का पात्र लें। पूजा स्थल की अच्छी तरह से सफाई के बाद पहले गाय का गोबर रखें, फिर अक्षत और फूल रखकर कलश स्थापित करें। कलश में जल-पंच पल्लव डालें। कलश के चारों ओर गोबर लगाएं। कलश के ऊपर एक पात्र में अनाज रखें और फिर घी का दीपक जलाकर षोडशोपचार से देवी पूजन का संकल्प लें। इसके बाद पहले गणेश भगवान फिर इष्ट देव और फिर देवी की आराधना करें। देवी को मिष्ठान का भोग लगाएं।

Monday, October 08, 2018

Mahalaya Amavasya 2018 Date And Time: महालया कब क्यू मनाया जाता है जाने इसका महत्व


◆ नवरात्र आने वाली है और नवरात्र से ठीक पहले आने वाली अमावस्या को महालया अमावस्या कहा जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि इसी दिन से माँ दुर्गा को धरती पर बुलाया जाता हैं और साथ ही साथ दुर्गा पूजा की शुरुआत भी इसी दिन से होती है। तो आइये जानते है महालया अमावस्या के बारे 

ARYA NEWS LIVE
Published on: October 8, 2018


Mahalaya Amavasya 2018: महालया ये त्यौहार बंगालियों के प्रमुख त्योहारों में से एक है और महालया को ही दुर्गा पूजा की शुरुआत के तौर पर मनाया जाता है।

नवरात्र से ठीक पहले आने वाली अमावस्या को महालया अमावस्या के नाम से जाना जाता है। यूं तो यह एक बंगाली त्योहार है लेकिन इस त्यौहार को पूरा देश बड़े ही उत्साह के साथ मनाता है। बंगाली लोगों में इस पर्व की तैयारी 1 महीने पहले से ही शुरू हो जाती है। इस साल महालया अमावस्या 8 अक्टूबर को मनाई जाएगी। महालया को देश के अधिकांश हिस्से में पितृपक्ष के आखिरी दिन के रूप में मनाया जाता है। इस दिन पितरों का श्राद्ध कर उन्हें दोबारा विदाई दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि अगर पितरों को ठीक से विदाई न दी गई तो वे नाराज हो जायेंगे और श्राप दे देंगे लेकिन, अगर पितर खुशी-खुशी विदा होते हैं तो वह अपने साथ परिवार की सारी परेशानियां लेकर चले जाते हैं।



★ महालया पर्व क्या है?

◆– महालया ये त्यौहार बंगालियों के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इसे दुर्गा पूजा की शुरुआत के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन भक्तजन शक्ति रूपी मां दुर्गा को धरती पर महिषासुर रूपी बुराइयों से आम जन की रक्षा करने के उद्देश्य से बुलाते हैं। ये त्यौहार आश्विन माह की अमावस्या को मनाया जाता है इस दिन श्रद्धालु मां दुर्गा की पूजा करके उनका आह्वान करते हैं और इस आह्वान के बाद माँ दुर्गा का आगमन हो जाता है। वैसे तो इस त्यौहार का हर दिन काफी महत्त्व रखता है पर षष्ठी से दशमी तक का दिन काफी महत्त्व रखने वाला दिन है, वैसे तो कई दिन पूर्व से पंडाल बनाए जाते हैं पर माँ दुर्गा की प्रतिमाएं षष्ठी को स्थापित की जाती हैं। महालया पितृपक्ष का आखिरी दिन भी होता है। इस दिन वे लोग अपने पितरों का श्राद्ध करते हैं जिन्हें अपने पूर्वज के देहावसान की तिथि मालूम नहीं होती है।



★ कैसे मनाया जाता है महालया?

◆– महालया के दिन मुख्यतः सभी लोग अपने पितरों को याद करते हैं। उन्हें भोजन अर्पित करते हैं और उनकी पुनः विदाई करते हैं। इस दिन लोग सुबह स्नान करके मां दुर्गा की प्रतिमा की पूजा करते हैं। खाना और कपड़े दान करते हैं। पितरों के लिए चांदी या तांबे के बर्तन में पकाए जाते हैं। इसके बाद केले के पत्तों और सूखी पत्तियों से बने कटोरे में यह भोजन खिलाया जाता है। इस भोजन में खीर, पूड़ी, चावल, दाल और सीताफल शामिल होता है। महालया के दिन ब्राह्मणों को भोजन करा उन्हें श्रद्धास्वरूप दक्षिणा प्रदान किया जाता है। इसके बाद भोजन कर पितरों को विदाई दी जाती है।